4th International Conference & Gathering of Elders

@ Nourishing the Balance of the Universe @
A record was made on the stage of 24 prayers of different cultures were recited in very huge auditorium of Dev Sanskriti Vishwavidyalaya…..Hardwar…

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धौनी के साथ भी षड्यन्त्र


समझ नहीं आता आखिर भारतीय खिलाड़ियों के साथ बीसीसीआई इस घिनौने खेल को कब बंद करेगा। जिस धौनी ने भारत को 28 साल बाद विश्व कप जिताया आज वही क्रिकेट से सन्यास की बात कैसे करने लगा। पर्दे के पीछे यहां भी बीसीसीआई की चाल नजर आती है। यही भारत के सबसे सफलतम कप्तान गांगुली के साथ भी हुआ था। पहले तो किसी कप्तान और खिलाडी की पतंग को ऊंचाई में उड़ने के लिए ढील देते हैं फिर चुपके से उसकी डोर को काट देते हैं। धौनी की कप्तानी में भारतीय टीम ने कई रिकॉर्ड कायम किए है। वह जीवट कप्तान हर मैच में एक नई ऊर्जा के साथ टीम को लेकर मैदान में उतरता रहा है। लेकिन ऑस्टेªलियन दौरे से आ रही खबरों से लगता है कि धौनी के खिलाफ सोची समझी साजिश चल रही है। इससे अच्छा होता अगर टीम इंडिया और प्रबंधन धौनी पर विश्वास करते और टीम को ऊंचाइयों पर ले जाने में उनका सहयोग करते क्योंकि धौनी जैसे खिलाडी देश को बार बार नहीं मिलते।

जूते से नहीं वोट से करें चोट

पिछले कई जनसभाओं में एक दिलचस्प बात उभर कर आई है शू थ्रो। इस थ्रो से न नेता बचे न ही सामाजिक कार्यकर्ता। हालांकि भारत में आने से पहले ही अस्तित्व में आ गया था जब अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर पत्रकार ने जूता फेंककर विरोध किया था। लेकिन भारत में इसे  तेजी से विरोध का जरिया बनाया है। बात करें विधानसभा चुनाव 2012 की तो शायद इस अस्त्र से बड़े नेता नहीं बचे हैं। चाहे कांग्रेस के सिपहलसार राहुल की जनसभा हो या सिविल सोसायटी की, सब पर तोहफा खुले दिल से फेंका गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि केवल जूते फेंकने से क्या आप सत्ता परिवर्तन कर सकते? नहीं, उसके लिए आपको अपने अधिकार का प्रयोग करना है। तो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अचूक अस्त्र का विवेक से साथ इस्तेमाल करें। यही भ्रष्टाचारियों पर असली चोट होगी।

मन को छू गयी ऊंचाईयाँ

 

देव संस्कृति विश्वविद्यालय से चले सुबह पौने सात बजे। हमारी यात्रा है पहाड़ो के बीच में नए रोमांच की, जिसमें आपको कल्पना के पर भी लगेंगे साथ की वहां की स्थिति पता चलेगी।
बहरहाल, एक तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ दूसरी तरफ गहरी खाईयां ये नजारे जब भी मन में कौंधते है, मन एकाएक रोमांच से भर रहे थे। पहाड़ो के बीच घूमने का अलग ही एक मजा है। यहां प्रकृति पल पल में अपना स्वरूप बदलती रहती है, उस पल को चुराने को हमारा मन लगा रहता है। मैनें बचपन में पहाड़ो की कहानियां सुनी है, लेकिन हकीकत में जब इन ऊंचाईयों को देखती हूं तो लगता है, मेरा अस्तित्व छोटा पड़ गया है। चलिए आप भी उस आनंद की अनुभूति लीजिए जिसने हमारे अंदर और रोमांच भर दिया है।
हम चारों तरफ से पहाड़ो से घिरे शहर टिहरी के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य से धनवान शहर है, उपलब्धि के रूप में एशिया का सबसे ऊंचा टिहरी डैम भी यही हैं। लेकिन डैम के कारण यहां पर रचे -बसे लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े थे। सोचती हूं, हम लोग जिंदगी को अपना कहते हैं, लेकिन जब समय पूरा हो जाता है, तो न चाहते हुए हमें भी सबकुछ छोड़कर चले जाना पड़ता है।इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी तो नहीं।

दोपहर के समय हम टिहरी पहुंच गये, जहां ऊंचाइयों पर गायात्री शक्तिपीठ स्थापित है, हमें आज वहीं रूकना है। हम लोगों ने सुबह से कुछ खाया भी न था, इसलिए पेट का इशारा था कि कुछ मिलना चाहिए । इस संकेत का परिणाम या अतिथि देवो भवः का भाव था, हमें शक्तिपीठ पर स्वादिष्ट भोजन कराया गया। हम लोगों में थकान का भाव नही था, हम तो ऊंचाइयों से परिचय करने आये हैं। जहां हम रूके थे, वहां की प्राकृतिक सुषमा भी कम न थी, कई ऐसे  पेड़-पौधे और वनस्पतियां थी जिन्हेे पहली बार देख रहे थे।
अब हम कोटेश्वर और टिहरी डैम देखने के लिए जा रहे हैं, लेकिन शायद समय की कमी के कारण कोटेश्वर मंदिर नहीं जा जाएं ,ऐसी आशंका  थी, और हुआ भी वही कहते हैं मन में जैसे विचार आते है वैसा ही कुछ सामने देखने को मिल जाता है। लेकिन टिहरी डैम को देखकर सारी कमी पूरी हो गयी। यह डैम दो नदियों मिलंगाना व भागीरथी के संगम के जल पर बनाया गया है। यह एशिया का सबसे ऊंचा डैम है। ज्यादा अधिक जानकारी हमें नही मिल पायी। लेकिन ऊपर से देखने पर डैम और वहां पर काम कर रहे लोग बहुत छोटे दिख रहे थे। डैम देखकर आगे बढे़ लगभग 4-5 किमी की दूरी पर स्थित एक बाबाजी के तपस्थल पर भी गए, जहां वो नहीं मिले, लेकिन उनके शिष्यों ने वहां के बारे में सारी जानकारी दे दी। शाम होने वाली थी, इसलिए हमें लौटना भी था।
लौटते समय जो दृश्य थे, उनसे कल्पनाओं को नया आयाम मिल रहा था। शाम का लाल सूरज सफेद रूईयों की रजाई में छिप रहा था ,लगा कि वह शायद ठंड़ महसूस कर रहा था। हम लोगों ने लौटते समय एक गुरूद्वारे में जाकर मत्था टेका और गाडी में बैठकर आ गए गायत्री शक्तिपीठ पर। यहां शाम को बड़ा मजा आया, जब अपना खाना खुद बनाकर खाया,

वाकई सबने मिलकर बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाया। एक दृश्य जो रात को खुले आसमान में छत पर खड़े होकर मैंने देखा वो मेरी यात्रा का
अभूतपूर्व क्षण था। रात के अंधेरे में टिहरी के आस पास वाले गांव जब प्रकाश से जगमगा रहे थे, लग रहा था मानो नई नवेली दुल्हन पूरा श्रंगार करके सितारो की चुनरी ओढकर बैठी है, उसे शायद इन्तजार होगा अपने प्रेमी विभु का। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसे स्थानों पर रहने वाले लोगों के लिए कविता का विषय चुनना कठिन नहीं होता होगा। जहां प्रकृति दोनों हाथों से अपने सौन्दर्य और सुषमा को लुटा रही है। नीरवता और सौंदर्य से ओतप्रोत निशा में निश्चित ही कवि अपने हृदय की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों के अम्बार लगा देते होगें। इस रात की खूबसूरती अब मेरी कविता में भी आयेगी।
अगले दिन उंचाइयों का मजा लेने का समय है। उससे पहले शक्तिपीठ के व्यवस्थापक जी द्वारा दी गयी, यात्रा-वृतांत थाली का जिक्र करना जरूरी है। उनके द्वारा दो थाली पर हम लोगों के नाम एक घेरे में अंकित थे जो संकेत हैं भारत की अखंडता के जो कन्याकुमारी से लेकर जम्मू तक फैला है।
जिंदगी का असली मजा ऊंचाईयों को नापने में है जिनके साथ कुछ अलग ही रोमांच होता है। ट्रैकिंग मुझे बहुत पसंद है, इसके दो कारण है- एक प्रकृति का साहचर्य दूसरा अपने को रोमांच से भर देना। यही कारण था शायद हम सबने ट्रैकिंग का पूरा मजा लिया। कभी पैर सीढ़ियों पर तो कभी पहाड़ों की ऊंचाइयों पर। लगता है मानो देवी हमारी शक्ति का परीक्षण लेना चाहती है।
ये रोमांचभरी यात्रा कभी धीरे तो कभी तेज कदमों से पार की। मां सुरकण्डा के मंदिर की एक अलग कहानी है। वैदिक कथाओं के अनुसार देवि सती के सिर वाला भाग यहां पर गिरा था, और यह शक्तिपीठ सुरकंडा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह शक्ति का स्थल है, जहां से शक्ति का संचार होता है। अन्यथा इतनी ऊंचाई पर जाना सरल कार्य नहीं है। यह अवश्य ही अपने आप में एक विलक्षण स्थान है। अब समय है पहाड़ों की रानी की प्राकृतिक सुषमा को निहारने का। मौसम से आंख मिचौली खेलनी हो तो मसूरी आइए, जो चारों तरफ से पहाड़ो से घिरा हुआ है। सफेद बादलों की रूई से पार होती हुई बूंदों ने मसूरी में हमारा स्वागत किया। ऐसा मौसम जो पल पल में बदलता है। इस मजे के साथ ही हमने उन ऊंचाईयांे से विदा ली, लेकिन मन आज भी उन ऊंचाईयों और बादलों में खेलने पहुंच जाता है। फिर कल्पनाओं के साथ मिलकर निकल जाता है नए रोमांच की खोज में। जो शायद मेरी बुद्धि से होता है परे।

ये आजादी किस काम की

भारत की स्वतंत्रता का जश्न मनाने जब भी हम लोग इकट्ठा होते हैं, मेरे जेहन में अकस्मात ही दुष्यंत   कुमार की ये लाइनें कौंध जाती हैं-

ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छलए लोगो
कि जैसे जल में झलकता हुआ महलए लोगो
जो रोशनी का महल हमें आज दिखाई दे रहा है उसमें चमकने वाली रोशनी हमारे साथ एक छलावा है। ये गजल भारत की आजादी के बारे में और उससे जुड़ी त्रासदियों के बारे में भले ही बहुत कुछ बताए, आजादी के ख्याल के बारे में उतना नहीं बताती। जितना हम उनकी दूसरी गजल में जान पाते है-

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहींए
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

     दिल में सरफरोशी की तमन्ना लिए आजादी के मतवालों ने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया, तो उन्हें कुछ सपने संजोने का भी हक था। उन्हीं सपनों के साथ भारत आगे बढ़ रहा है। उस आजादी के ख्याल के बारे में हम सोचने का वक्त तो निकाल ही सकते हैं।
यह सही है कि भारत ने 1947 में अंग्रेजी राज से मुक्ति पाई और राजनैतिक मुखौटे के रूप में आजादी पाई। पर यह अपने में पूर्ण विराम नहीं था। आजाद होने के साथ ही भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी थी। अब भारत अपनी प्रगति का पथ स्वयं तय कर सकता था। हुआ भी कुछ ऐसा ही देश ने आर्थिक आजादी की तरफ कदम बढ़ाए। लगभग 200 वर्षों के बाद औपनिवशिक जकड़न को तोड़कर देश आर्थिक तरक्की के रास्ते पर अग्रसर हुआ। इसके लिए पहले समाजवादी तर्ज पर पंचवर्षीय योजनाएं बनीं और नब्बे के दशक में 1991 से आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत अब ग्लोबल विपेज की अवधारण में रच बसने लगा है। राजनैतिक स्तर भी हम प्रौढ़ावस्था में आ गए हैं, और हमारी अंतर्राष्ट्रीय हैसियत बन चुकी है तो थोड़ा सा थम के सोचने का समय भी है कि क्या हम कुछ भूल तो नहीं रहे। इस आजादी के दौर में कहीं हम उन पृष्ठों को खोलना तो नहीं भूल गए जो अभी तक अनछुए और अनखुले रह गए है?
आजादी दरअसल कोई ठहरी हुई प्रक्रिया नहीं है। जब हम इसकी एक खिड़की खोलते हैं तो नएपन का एहसास होता है, लेकिन जल्द ही यह भी गुलदस्ते में रखे फूलों की तरह बासी हो जाता है जिन्हें बदला जाना चाहिए। या फिर अभी और खिड़कियों को खोल देना चाहिए। हवा के और झोंके ऐसे है जिनका आना बाकी है। शायद यह एक वजह है कि दुनिया भर में आजाद और लोकतंत्र पर सवार देशों के साथ साथ उन देशों में भी आजादी के नए नए स्वप्न पलतेरहे हैं और देखे भी जाते रहे हैं जहां समाजवाद या साम्यवाद की तानाशाही को स्थापित करने की कोशिश की गयी है।
औरत की आजादी का मसला जो कई साल पहले शुरू हो चुका था वह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ज्यादा तेजी से उठा है। दुनिया के कई देशों में इस मसले पर चर्चाएं होती रही हैं और इस बात में कोई शक नहीं कि अरब देशों को छोड़ दिया जाए तो महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है। पहले की तुलना में स्त्रियों को अधिक स्वतंत्रता मिली है। लेकिन इसी बीच जेंडर जस्टिस की प्रक्रिया में एक और मसला आ गया, जैसे समलैंगिकों की आजादी का।

आज यह भी  एक बहस वाला मुद्दा है।
अदालतों से लेकर सड़कों तक इसके बारे में चर्चा और संघर्ष जोरों पर है। किसी तरह की अभिव्यक्ति की आजादी सैद्धांतिक रूप से भारत सहित दुनिया के कई देश के लोगों को मिली हुई है। लेकिन इसके साथ एक कड़वा सच यह भी है कि आज भी दुनिया के कई मुल्कों में अभिव्यक्ति के खतरे हैं जिसकी कीमत चुकानी पड़ती है। यानि सिद्धांतों की पोथी व्यवहार के धरातल पर धराशायी हो जाती है।
कई बार ऐसा होता है कि आजादी यानि मुक्ति की मंजिल पा लेने के बाद फिर से नई गुलामी की जंजीरें व्यक्ति, समाज और देश को जकड़ लेती है। इसीलिए आज दूसरी या तीसरी जंग-ए-आजादी की बात सुनाई पड़ती है। मिसाल के तौर पर 1949 में चीन एक नवनिर्मित स्वाधीन देश बना लेकिन सांस्कृतिक क्रांति के दौरान वह फिर एक नई तरह की  दासता में फंस गया। फिर जब वहां से निकला तो उदारवादी नीति अपनाने के कारण अवहां फिर से दमघोंटू वातावरण बनने लगा है। इसी तरीके की आजादी की तस्वीर फ्रांस की सरकार के फैसले में दिखती है जहां सरकार ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाया है। एक तरफ फ्रांस सरकार का कहना है कि बुर्का औरत की आजादी को संकुचित करता है तो कुछ मुस्लिम संगठन इसे मुस्लिम औरतों के बुर्का पहनने के अधिकार पर प्रतिबंध मानते हैं। फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में इसे लेकर तीखे विवाद हो रहे हैं। प्रश्न यह उठता है कि किसकी आजादी की अहमियत ज्यादा है? क्या यह आजादी बनाम आजादी का मसला है?
कहीं न कहीं आज भी हम पूर्ण रूपेण आजाद नहीं हो पाए हैं। अभिव्यक्ति और सोच की स्वतंत्रता कितनी है यह बताने की जरूरत नहीं है। सोच की स्वतंत्रता से मेरा अभिप्राय है विस्तृत सोच का दायरा। हमें सोच के दायरे और फलक को विस्तृत करने की जरूरत है। जग कोई धर्म, राजनीति, समाज, सम्प्रदाय और सीमा के नाम पर लड़ाई करने को आमादा हो जाता है, तब बड़ा अजीब लगता है। आज के दौर में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध को खोजना बड़ा आसान है, लेकिन एक इंसान का मिलना कठिन है। क्योंकि इंसान की सोच सिकुड़ गयी है जिसमें वह अपनी आजादी को भी अपनी गुलामी बना लेता है। लोग गुलाम बनकर भी खुश होते हैं जबकि यही सारी तकलीफों की जड़ है। एक बार इन बंदिशों से बाहर निकल आए तो समस्याओं का समाधान हो सकता है। इन बंदिशों से बाहर निकलते ही हम जिंदगी के असली स्वरूप से परिचित हो जाते हैं। एक व्यक्ति आज सबकुछ बनना चाहता है, लेकिन इंसान नहीं बनना चाहता है। अगर विचारों की स्वतंत्रता में जीने लग जाए तो किसी प्रकार की दासता का भय नहीं रह जाएगा। फिर न राजनैतिक प्रक्रियाएं दासता पैदा करेंगी, न धर्म मनुष्य को बांध पाएगा, न कानून स्वतंत्रता का रास्ता रोक पाएगा। व्यक्ति स्वतंत्र होगा लेकिन स्वच्छंद नहीं। यानि दुष्यंत कुमार को फिर नहीं पड़ेगा-
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए ।

आओ करे रथ की सवारी

कितने गरीब हैं ये लोग जिनके पास चलने के लिए गाडी तक नहीं है और हाथ्‍ा में सियासत नहीं हैं। करें भी क्‍या करें जनता से प्रेम का कर्जा वसूलने का समय भी तो नजदीक है। अगर अभी जनता को भावनाओं से चढा मुलम्‍मा पेश न किया गया तो, भीड दूसरी ओर भी रूख कर सकती है।

नेकिन घबराने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि ये भारतीय लोकतंत्र में शामिल हुई भीड है। जो अपने वजूद के लिए कभी नहीं लडती । ये लडती है तो भीड के लिए जिसका कोई वजूद नहीं हैं। आप अपने कर्जे को ब्‍याज सहित वसूल कर सकते हैं। इसलिए आप करें रथ की सवारी ।

करो विचारों की पूजा ….

समझ नहीं अाता आजकल क्‍यों लोग विचारों की पूजा कर रहे हैं । क्‍या केवल विचार ही हमें उत्‍कर्ष की तरफ ले जाते है । जी यह बात बिल्‍कुल सच है कि वैचारिक क्रांति ही आगे के समय को बदलने वाली है। तो आइए शामिल हो जाइए इस लहर में जहां केवल आगे बढ्ने का मौका है ।